ज्ञान - राशी

हिल्दी माषा में पूर्ण हपण ज्ञान ग्राए करने के लिए एकमेद उपयोगी एस्तक

लेडक तथा प्रकाशक-- हशनतज्ञ पफ्रिल्दस, पच्चिशित छॉयरेटिद सोसाहटौ, ज्ोधएर

प्रथम आज्डत्ति

स्वर, १६४४, मृल्य

ज्ञान « शशी

( हिन्दी शापा में पूर्ण रुपेण ज्ञान प्राष्ट करते क्रे कि एक्मेव उपयोगी पस्तक )

लेखक 6था प्रकाशक-- नेशनत्ष मिनट, पब्लिशिंग कॉपरेटिंव सोसाइटी, लिमिटेड ब्रोध'

प्रथम आइृत्ति

पयखबर, १६५४. मूल्य १-४-०

4

गा

्ट दृ ]

विषय--सुची

परयोयवाची शब्द है अलंकार 2 शुण उसके प्रकार

अशुद्ध शब्दों के शुद्ध रुप “** विपरीत शब्द

एक से शब्दों का सुद्म भेद

कुछ पौराधिक विषयों का स्पष्टीकरण मुहार्थ शब्द

समास हक

निवनन्‍्ध रचना का अभ्यास"

खेती

१्झ्ख ...

घोड़े का वर्णन

ध््दूघ

चाय 2 पक

जियो का आदर

हाथी ... शा न्न होल ... 4: कर मह्ठात्मा गांधी

१० ज्ञोधपुर

११ चाल बिबाहू कि

शर३ भेल्या ... 9:

१३ रक्षा बन्धन

नह १७ ही! + श३ "० १६ + १८ २५ *+ श७ *० ३१ ३५ ३३ हे "३७ "भर हम, 59 हे: > 3७ *+ ४६ हर

१४ विद्या ««« डे ल्‍्ल

१४ सम्राचार पत्र दा हंं १६ दिवाली 7; १७ बषा ऋतु 50 १८ रेल यात्रा १०

१६ हमारी बरेमान शिक्षा पद्धति २० निबंर्धों की संक्षिप्त रुप रेखाएँ

११ कहानी लेखन हैदर

१२ अम्तर्कथाएँ

१३ पत्र लेखन हे डे १४ चर्ण विभाग ने के १५ घाक्य विचार हे हु १६ कह्दावतें

१७ मुहाबरे ** फेर

१८ देलगाड़ी ** नम

१६ विद्यूत शक्ति हे

२० एरोप्लेस ध्यायुयान ४४

२१ टेलीफोन कब ह्ज्>

॥%॥)

पयोगवावी शब्द

प्रम्मि- परावक, बसु, वन्हिं, दहन, बुक हिरः यरेता, आग, धर्न॑ज्ञय,

तर + , दृम्मि, प्रसाद

आँत-- लोचल, नचन, चक्त नेत्र हग | झंब्रेरा-- अंध. तमिस्त, तम, तिमिर, अंध्यार | अनार-- रक्त बीज, हालिक, करक, शुकप्रिय, दाड़िस अख्त- अ्रंम, सुधा, पीयूप, मुरभोग, अगद्राज, सोम आकाश-- लक, व्योस, गणत, अम्बर, अनन्त, ख, पुष्कर वियत

चल्बास, सुरण्स शआास-- आम्र, साल, चूतः, पिकम्न्नम, सा

औल्टेनल

सच्चा, सालती-सुत. शतपन्‍्यू, चद्धधर, आखंडल, देवराउ घरणाक, सुरपति, दुवपॉतत, चनाचन, तुशापाट, परजन प्राचीर्पात

छंवोष्ट, बक्रप्रीय तापस्त, यती, ब्रती, ठपी पावल, मपी, दीपछुत, लोकांजन 3

80 258

ध्यूतर-- पारावात, आरक्तपद, कलरब, कप्रोत

फुमल-- पुष्कर, पयोज, जलज्ञ, महोत्पल, कल, शाजीब, बारिज पद, भोज, पंकज, सरोज, वारिज्ञात

कणों--.. श्ोत, अबण, शू.ति, शब्दयद, कान !

कधच-- बख्तर, यर्म, श्रवधान, देहन्ाण, मर्म-रक्षक, दंशन।

कस्तुरी-- मसगनामि, भुयमद

काग-- सक्षत, परमृत, कग्ट, आत्मघोप

कुत्ता-- सारमेय, रत रीर, श्या, कौलेयक, श्याल।

कुबेर-- घनद, पुण्यजनेश्वर, वेश्वदण

केश-- अलक, शिरोरुह, चिरक्कर, कच |

कोकिल-- परत, चनपत्रिय

क्रोच-- '५०तेघा, सिश, अमरप, तमख, कोप, छुथ, रोप

कामदेव-मदन, मनोभय, मार, समर, मयन, मनोज, ध्यनन्ञ, रतिपति।

क्पव्ृण--सुर-तरू, हरिचन्दन, मन्दार, पारिजात, देववृत्त।

स्वैंग-- कौक्षेयक, त्तल्वार, चन्द्रद्ास, करबाल,, कृपाण, खड़ग

गशेश-- गणपति, गण-नायक, एक दुन्त, छाम्बोदर, गजानन, धृम-कतु चिरमेही, वाल्िय, खर, मर्द

गाय-- माता, गाहेइ, गऊ गो, रोहिणी, गनाय

गीदेडू -

भूरिमाय, बंचक, शिवा झग, धूतेक, श'गालु, कोप्टु, जंबुक शुलाब-- थलज, कमल, पौण्डरिय, पाटल

गधा>+

गंगा-- भागीरथी, सुरसरि, विधगुपदी, मंदाकिनी, निर्जरनदी घर-- गेह, भवन, निकेतन, सदन. ग्रह

घृत-- सार शाध्य, सरपिप, हृथिष, घत रस, घी।

घोड़--

हसिकरांत, ढवी, तुएंग, चातायन, रांधर्ण, अश्य, चामरई श्री पुत्र, वाज्ञी,

(३)

नियुणु, विज्ञ, ऋृति, प्रवीण, कुशल, सुमति। उत्तम गधा, तुघ्रृतन। सोम, अम्ीकर, शशि, द्विज,

चतुए- वैज्ञानिक, शिक्षित चमेत्री-- मालती, छुमता चल्रमा- म्ंक, रजनोपति।

' चांदी- रजत, रुप्य, कलघौद, सित्त, हुंश चाँदनी- ज्वोतस्ता, कौमदी, चेंद्रीका !

चोर-- स्थेन, दस्यु, प्रतितेधि, मोसक, तस्कर, गन्धसार, श्रीखस्ड, हरि, मलयज | कल: वबारि, अम्बु नीर; तोब, सलिल, पानी

तक॑श्त- ध्पासंग, तूण, भाथा, निपड्, वृखीर, पिडुरी। तालाब-- हद, पुष्कर, क्रासार, सर, सरसी, तालतज्ञांग |

दर्पण - कांच, प्रतिविस्धी, आदर्श, गुकर. स्वकर दान- त्याग, विद्ापित, निरविशण, वितरण दीपक-- दीप, दशेबन, नेहप्रिय, दशाकर्श, नेहाश, ग्रहरमान

- अह्ृनि, बासर, दिवस धर्ी-- प्रथ्वी, ज्िति. चोणी, बसुधा, जगति, चसुमति भू, थक धर्मएज--बंबस्वत, पिन्रपति, शमन, प्रेतपति, महिषध्यज, समवर्मी, बम !

मुधाकर,

एकागारिक, पाटच्चर

सदी-- सरिता, तदिनी, तरंगिनी, श्रोति, दगा, ललसाल संन्र-- ज्ौचन, अंक, चत्तु | दाग, ईक्षणु, तन, आस | चौकए- दास, अनुचर, मृत्थ, किकर, परिचारक परवीह्द- दर्षाप्निय, वाह्ीण, चातक, सारंग।

थ्वी-- चिति, क्षोणी, धरती. बदुधा बसुमती, जगती। पबंत-- पहाड़, नग, अचल, सृधर, शेल, शिरि !

परदेन-- मारुत, दायू, बबाएं, नसल्वत, आजिर, मातरिश्वा, प्रपदश्य गन्घयह, प्रभंजन

(६)

शीश-- ललाट, अलिक, रु, गोधी, भाग, भाल, बाहर। शैया-- शयन, कशिएु, तल्प, सम्वेश्न, सेज, शयनीय सप-- उरणग, भुज॑रा, नाग, काकोदर, पन्नम, विपधर, चक्नुअबा, व्याए अहि, कालि, शेष हीरा-- निक्‍कु, पदिक, बजू। हंस-- मानस, ओक, मराल, स्वेत, गरुत, चक्रांग हस्णि-- एण, प्रपत, सारंग, कुरंग, शंग, अजिनयोनि! हरडे-- अभया, पत्थया, अव्यथा, अम्ता, चेतकि, दरीतकी। हबा-- पवन; मारुत, समीर, वायु हाथी-- गज, हस्ती, दम्ती, द्विरघ, कुजर, नाग, मामज, मातंग | अषप्टसिद्धि-अणिमा, मद्दिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, काम, प्राकम्य, ईशित्य, नवनिधि के नाम-- भहापद्य अरू पद्म पुनि कच्छप मकर मुकुंद | शंख खब अरु नील इक कहियत अरू इक कु'द्‌

अध्याय-- अलंकार

१. शब्दों में तथा काव्य में व्रिशेपता प्रगट' करने के लिये जिन शब्द का प्रयोग किया जाय, जिससे उनमें चमत्कार या सौन्दर्य -मलके, उस लकार कहते हैँ

अलंकार तीन भागों में वांदे जा सकते हैः-- (१) शब्दा अलंकार (२) अथोलंकार (३) उमयालंकार !,

(४)

) जब रचना में शब्द - संवन्धी चमत्कार होता है तो उसे

शब्दालंकार कहते दें जैसे - “इस सौंदर्य को मन्त होकर सत्य करले लगा”

3 2350 कद (>) जहाँ अर्थ संवन्धी - चमत्कार होता है वहाँ अथोलंकार

शुरुषद पदुम पराग” 'लक्कर और अधोलझ्भार दोनों एक दी बराक्यावल्ली चा ऋथन में दिद्यमान हो और दोनों का सौन्दर्य एक साथ देख पड़ता

हो, वहाँ उमम्रालंकार होता है। स्पेक्त च्दाहरण में ब्मयालंकार भी हे।

शब्दा अलंकार के कई भेद हैं - उनसे से मुरुय थे हैं:-- अनुआस्त- एक ही अक्षर का वार आना अद्याप् होता है - मत ञ् ही स्वर 5 सयूर- मत्त में 'म? की, चतुर चित्तेर में 'ब' और 'हा

की आादृति वार है अमक- . ज्ञत् पद खर्ड, पढ़ था पद समूह की आवृत्ति भिन्न अर्था

से होती है तो य्पक अलंकार होता है। “अलरन सरन का चरन गनपति” में रत की आृति मिन्न अर्थ में है शतेप--. जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक अर्थों में आते तो पहला होता दै। जैसे - मतवाले आपस में लड़ते हैं. (मतवाले-पागल और मतवाले--मज़इबी लोग)

घर

अशलकार १०० से ऊपर ईं उनके कुछ भेद निम्नलिखित हैंः-- डपमो-- लव किसी छुम्दरता का बच करने के लिये किसी वस्तु से

छुलनना की जादी है तो व्से दपमा अर कहते हैं. -- मुख चन्द्र के समान उज्जवल है!

(«6३ .) रपक--.. जिस वाक्य में कवि उपमेय और ब्यमाच को पक नही करते, किन्तु उनको छिपा लेते दे उसे रुपफ कहते दे जैसे - मुख चन्द्र है स्मोेज्ञा-- ज्पमेय में उपमान की संभावना की जाती है जैसे मुर मानो चन्ध हे हे

२. प्रसंग:-- प्रमंग से अभिग्राय यह है कि यह किस अवसर का, किसका कथन, किसके प्रति और किस प्रयोजन से है इस लिये प्रसंग देते समय जहां तक हो सके यह बतलाना आवश्यक है कि कौन, किससे, किस अवसर पर भौर फिस पहेश्य से कहता है

३. अम्तर्कथाः-जिन पत्मों में कोई अन्तर्क था हो और यदि परीक्षक उसके लिखने को विशेष हूप से कहे तब्र तो उस कथा को अ्रव श्य लिखना ही चाहिए। श्रन्यथा उसको प्रथक लिखने को आवश्यकता नहीं फेवल सक्षेप मे उसका उतना भांग

जितना अर्थ की पूत्ति के लिये आवश्यक दो लिख देना ही पयाप्रि हे सारी गाथा गाने की आवश्यकता नदी

व्यास्या:--व्यास्या का अम्िप्राय हे - दीका टिप्पीनी पूर्बक या विस्तार - पूर्वक अर्थ लिखना भ्रथोन्‌ प्रसंग (कौन, किससे, किस अवसर पर, किस अभिप्राय से कहता है)» अन्तकेथा (यदि कोई हो तो)-पिंगल, रस, अलंकार, गुण और दोप का बतलाना, आक्तेपा का समाधन, इत्यादि, सभी आवश्यक वादों की स्पष्टीकरण व्याख्या है। यह कार्य साधारण योग्यता वाले के लिये कठिन है।

अलुवाद- किसी बात को एक भांपा से दूसरी भाषा में बदलने को अनुवाद कहते हैं, परन्तु आधुनिक काल मे किसी बात को

पथ

सर

हब

६. भावा्थ--किसी ऐसे पद्य गद्य का अर्थ जिससें कवि ने अपने विचार प्रगट किये हों था कोई बात दूसरे पर डाल कर कही हो तो उसका बह अथे, जिससे वास्तव में कि का मतलव है. बस अरे के प्रमट करते को माजार्द कहते हैँ मार्थ को दूसरे शब्दों सें सायंश, वात्पयी्थ या संचिप्तार्थ भी कहते हैं

गुण

रुप फो बढ़ाने वाले धर्म को “शुर” कहते है।

गुण के तीन भेद

(१) भाधुय्ये

(२) ओज

(३) प्रसाद महुरस्य-- जिस रचता को छुनकर चित पिगल ज्ञाय उसे

'माधूर्य युण' कहते हैं !

जिस स्चन्त से जित्त में उत्तेजना, वीरता और साहस बढ़े उसे चोज गुण' कहते

जिस रचना को सुनते ही उसके अर्थ का ज्ञान दो जाय इसे 'पर्ाद बुण' कहते हैँ।

₹१० )

अध्याय हे

शब्द अध्ययन

अशुद्ध शब्दों के शुद्ध रुप संस्कृत भाषा में शुद्ध शब्दों को तत्सम झुप थी प्रशुद्ध शब्दोंवी तद़ब रुप कहते हैं।

श्र. शब्द (द्व3) शुद्ध शब्द (पत्र). श्र, शब्द (तक्घ) शुद्ध शब्द तरग,

अगनि अग्नि कान कण अरथ श्रथे किसान कृपक श्रसीस आशिप कुम्हार कुम्मकार झाधीन अधीन स्यान ज्ञान अंगृूठा अ्रंगुए घनिष्ट घनिष्ठ अत्याधिक अत्यधिक चिन्ह चिह्न आह्हाद भ्राह्नाद व्योतिष विद्या ज्योतितिया आवश्यकीय आवश्यक... ज्रेबरार्पिक ब्रिवार्पिक ओऔपधि ओपधि, औषद दुराबस्था ड्स्वखा ६] र्््प्या लनि्धेनी (निधन बपरोक्त उप का शाहुक प्राहक उपलषत्त उपलब्य घए्‌ गृह एकद्रित. * एकत्र छ्न च्ष्श्णु ण्क्यता ऐक्य, एकता. चमार चर्मकार किवदन्ती किंवद्भ्ती त्ञत्री ज्ञत्रिय किम्बा किया चोंच चच्चु कल्लेश क्ल्लेश

ले चुसन्त स्वरित कपूर कपूर दोपहर हिपहरी

( ९)

आखद्व्‌ तड़वी शुद्ध शब्दकसण)। अजन् छड़व। शुद्ध शब्द (तत्ता॥)

निरसेगी निरोग राजमेतिक राजनीतिक पेव्रिक पैदुक राष्ट्रीय राष्र्य प्राढ प्रकट श्र प्रतम श्र्ठ "प्रकुद्नि गुल पछ्ठम पष्ठ पत्थर प्रस्त्र्‌ सभ्जन पुमुप सब्जन भाष बाप्प सदा - सर्वदा सदा, सर्बदा भैंस महिप सस्मान सम्मान क्च्छि चच्छ्क सम्मुख सम्मुख सक्खी सन्िका समतुल्य सम, तुल्य प्ह्र प्रहूर सम्बन्‌ संवात्‌ सेट भ्रेट्ठ सविनयंपूर्यक का शक्कर शबीसा विलय पूर्वक सांकल आला. साथु सब्झत साधु, सम्जन प्रिमष्दा प्रिंबदा.. सिब्न सेचन फाह्मुण फान्ुन॒. सौजन्यता सौजञन्य आम्हृणु ऋआहयणु संगठन संघटन भाग्यमान, भाग्वान्‌.. स्वयस्वर स्रगंबर मुह सह के अब्याय ४.

विपरीत (विलोग) शब्द

. निम्न लिखित शुद्ध शब्दों के साथ उनके विज्ञोम भी बतलाये गये हैं.

शुद्ध शब्द लोग) शुद्ध शब्द (बिद्चोप) अपना पराया आदर अलादर अ्र्च्छा बुरा हे आशय निएशा अनावृष्र अतिबूष्टि झाब

व्यय

आकाश आदि थ्रागे आज्ञा अपकार अधघम अन्त ड्द्य उन्नति जीवन कृश दानी नूतन प्राचीन सफल ण्क्‌ पंडित कृतज्न मुझबसर क्रय ग््ट्या खोटा जय सदाचारी भाहार

(बिलोग)

पाताल अन्त पीछे अवज्ना उपकार उत्तम अनन्त अस्त अबनात भरण स्थूल कृपरा पुरातन अवौचीन निष्फल अनेक मूर्ख कनघ्न कुअवसर बिक्रय मीठा खरा पराज्ञय दुराचारी निराद्वार

शुद्ध शब्द

चतुर साध्य स्वाभाविक लाभ ज्ञान कुटिल ऊँच विदेश ज्ञात दुगैन्ध द्नि दोफ घमात्मा निबत न्याय पाप अकाश पावन अदह्यचारी महात्मा यश राजा विप शोक स्वततन्त्र

(बिलोपू)

मूर्ख असाध्य अस्वाभाविक हानि अज्ञान सरल नीच स्वदेश अ्ज्ञाव घुगन्ध ण्त

गुर फापात्मा सबल अन्याय पुएय अंधकार अपावन व्यमिचारी डुरात्मा अपयश र्ड्ू अमृत ह्ष परतन्त्र

शुद्ध शब्द विलोग) शुद्ध शब्द तिल स्थावर जम घुलभ दुलभ चल्बान निर्वेलल बीर अबीर सुख दुख ण्मी सर्दी मसलन निर्मल जब पराजय ऋणी ञ्ऋणी जड़ चेनन नास्तिक आखिक सज्जन दुजन प्रसन्न अप्रसन्न साकार निराकार सीधा बक्र सगे नरक समेह्‌ द्वेप हार अनुदार द्यालु निर्देयी ख्त्कर्ष अपकर्ष अध्याय -युग्म- (जोड़ा)

एक से शब्दों का सुक्षा भेद प्रसाद-- छा, देववाओं का भोग | प्राखाद-- महल

इपेज्ञान- ध्याग, अस्विकार

अपेक्ञा- चाह, अमिलापा, आशा, मुकाविला "न मर प्रहू--

पकड़ला, नक्षत्र (अह नव प्रकार के होते दँ छुल-- बहु, घराना, तमाम

कूल-- तद, किनारा, तालाब, नहर

परिणाम -- नतीजा, फल,

पसिमण-- अन्दाजा

( ९४.)

प्रमाण-- सबूत

प्रणाम-- नमस्कार

सुर-- देवता विद्वान,

सूर--. योद्धा, स्ये, आचारये शुक्कू-- स्वेत, निर्दोष, उजाला पक्त, शुल्क-- फीस, महसूल, चंन्दा, इनाम वृूज--.. ब्रज (कृष्ण की जन्म भूमि) बजू--.. इच्ध का शस्त्र, हीरा, बरछा स्््+ जयाहरात, मणी:

पापाएु-- पत्थर

संकोच-- तनाव, लण्जा, डर लज्जा-- लॉज,

ओज्ष-- तेज, प्रकाश, (थोड़ी देर तक रइने बाल) काव्य का गुण तेज- प्रवाप, आभा, (सदा रहने बाला या स्थाई)

आय-- आमदनी

व्यय-- खर्च

काम-- कामदेव, (पु० लि०)

बामना-- इच्छा, (स्त्री० लि०)

झज्-- जइवबुद्धि

मूले--. जिसे छुछ ज्ञान हो।

दया-- दूसरों के दुःख को दूर करने की स्वाभाविक इच्छा छुपा - छोटों के प्रति दया

अलौकिक-- जो लोक और समाज में पहिन्ते देखा गया हो | अस्वाभाविक- जो सृष्टि के नियम के विरूद्ध हो।

अम--. असावधानी से जहां सन्देह हो

प्रमाद-- मूखेता और मत्तता से जद्दां सम्देह हो

( शश )

झजन्लान-- जिसमें स्वाभाविक बुद्धि हो

अनसिक्ष- जिसे सममते को अवसर ही ग्राप्त हुआ हो

इंप--. किसी कारण से घुणा करला

ईपो- वे कारण दूसरों की बढ़ती को देख कर जलता

श्रम -.. शरीर के अड्ढों से कास करना

आयास-- मल की शक्ति से काम करना

परिश्रम -- श्रम की विशेषता को परिश्रस कहते हैं

उत्साह-- कार्य करने की उमंग

आ्योग-- काम में लग जाना

इथम ड्योग की स्थिरता को उद्यम कहते हैं !

प्रथास-- सफलता के समीप उद्यम का नाम प्रयास है

चेश- किसी कार्य का बाहिरी प्रथत्ष करता चेष्टा है

युक्ति--. ऊक्लिसी कार्य का हेतु दिखलाना युक्ति हे

तक-- चुक्ति की कसौटी को तक कहते

बाद--. किसी निणोय पर पहुँचने के लिये युक्ति-प्रत्युक्ति को बाद ऋहते हूँ

प्रैम--. साथारणतः हृदय के आकर्षण का भाव प्रेम है अ्रद्धा- बड़ों से जो प्रेम हो उसे श्रद्धा कहते हैँ

भक्ति- देववाओं से जो प्रेम हो बह भक्ति है

स्नेह-- . छोटों से प्रेम को स्नेह कहते हैं

प्रणय-- बी में जो प्रेम हो उसे प्रणय ऋते हैँ.

ज्ञान-- किसी ब्रिषथ् को सली प्रकार जानता ज्ञान बुद्ध मतकऊी ठीक बृति का साम बुद्धि हे धी- बिचारने की शक्ति को थी कहते हैं मति-

झा करने की शक्ति मति है

( १६ )

मन-- स्मरण रखने की शक्ति (झानेन्द्रीय) का नाम मन है

चित्त-- ज्ञानने बाली (चेतन) छानेन्द्री यको चित्त कहते हैं.

मानप- इच्छा में ज्ञानेन्द्रीय का मोम सासप हैं

हृदय-- अलुभव-करने वाली छानेन्द्रीय का नाम हृदस है

श्रन्त'करश-- वाहिरी इन्द्रीयों से सम्बंध एखने को अन्वाकरण

कहते है.

दुः्व-- मन से छुःख होता है

शोक-- चित की व्याकुलता की शीक कहते हैं.

क्षोभ-- मन्माना काम्त होने को नोम कहते हैं

खेद--.. निएशा को खेद कहते हैं

बिषाद-- दुःख की विशेषता में कर्तव्य और शान फे स्ट होने को विषाद कहते हूँ

अध्याय ५. कुछ पौराशिक विपयों का स्ट्रीकरण --

प्राथीन काल में दानव लोग देवताओं फे यज्ञ तथा तफत्या में बाधा डालते थे उनसे बचने के लिये आपस के भेद-भाव की छोड़ कर वे भगवान कृष्ण के पास गये और उनके कहने के मुताबिक उन्होंने सागर का मंधन किया जिसमें से जो रश्न निकले, उनके नाम इस प्रकार हैं

श्री, रम्सा, बिंप, वारुणि, अछृत, शंख, ऐरावत (हाथी), धमवन्तरी, आस घेसु, कप दृच्त, चन्द्रशा, सूर्य का घोड़ा, ससि )

(९। योग का साधन प्रत्येक प्राणी सहीं कर सकता और जो कएगा चाहूदा है. उसके लिये कम बघ अष्ठांग योग निम्न लिखित प्रकार कएना आवश्यक है मिससे बह इस योग मे सफल हो सके:-

( २७ )

यम, तियस, आसन, आणायास, प्रत्याह्मर, घारणा, ध्यान, समाधि | हे (३) भग्खान श्रीकृष्ण से गीता में कहा हे कि जब धन की * हानी होती है और पापों का इत्कर होता हे तब पापों री के लिये मैं (कऋष्ण) युग में अबतार धारण करता हूँ। प्रकार अवतार घारण किये

क्रस्ने जिम्न

सत्त्व, कूमे, वाराह, सूर्सिह, बामन, परशुराम, रामचन्द्र, ऋष्ए, बुद्ध, कल्कि | (४) आचीन काल्न में पुराणों के सताठुसार संस्कारों का अधिक ध्यान रखा जाता था परन्तु समय के परिबर्तेन से इनका लोप होता जा रहा है। पुराणों में अत्वेक क्णी के लिये सोलह संस्कार रबखे गये बे इस अकार हैं:- गर्भावान, पुंसवत, सीमास्तोन्नयन, जातक, नामकरण, सिष्कमण, अन्न-प्राशस, मुए्डल, कएँ-बेध, उपनयन, वेदारम्भ, समाबत्तेन, विवाद, वानप्रस्थ, सन्यास, अन्त्वेप्ठि (४) छिसी वर्णत को सुनकर या पढ़कर ऋधया न्ाटकादि का अभिनय देखकर हृदय में जो एक स्थायी और अपूर्व भाव पैदा होता इसे रस कहते हैं. रस नौ प्रकार के होते हें:- कर श््वार, वीर, और शान्त

आईू

करुणा, अद्भ द, रौद्र, भयानक, वीमत्स, हास्य

(६) हिन्दु धर्म के अछुसार अठारद पुराण बताये जाते हैं। उनके चास इस प्रकार हेँ:--

मत्स्व, कूमे, लिंग, शिव, स्कन्द, अन्नि, विष्णु, नारद, भागइत, $

गरुंड, पक्ष, वाराह, ब्लह्माए्ड, जल्मवेबर्त, मारकण्डेय

कण्डेय, वास, अद्य, मविष्य

(2 |

(3) पुरा कया वेदों के मताहुललार चोदद-विद्या बतलाई है। मो इन सब्र विद्याओं का अध्यन कर लेता या बढ़ पे विहाने रि जाता था। इन विद्याओं के नास इस अबार हैः- ब्रक्नज्ञान, रसायन, स्वप्सापत, बेदन्पाठ, ज्योतितल, हयावरए शास्प जिया, जन्नतण, पेय, काव्य कला, फोक, अधारोहए संम्राधान करण, चाहुे

गहब-शद्द (४) वेदों के काएइ:-श्ान, कप और उपासना आम के प्रफारः- चडशप्रि, द्वावाप्रि और जदराप्ति शरीर की अवस्था: >पाजिपन, यौपन, इड्धा अवत्या। शरीर के मुण, - सत्तोगुण, रजोशुण, तमोगुण ऋण-देग कण, सि-अण, पफित - आण कम के प्रकार.-- सब्ित, प्रास्ट्ध, कियमान देवः-बहा, विष्णु, मद्देश, लोकः--आकाश, पाताल, सत्यु निल पद्मार्थ तीन अर के दोते हैं- जीव) चह्मा, प्रकृति शरीर फे दीन रुप होते हैं>सूरम, श्यून और फारए रुप « काल तीन पकार के दीदे हैंः--वर्त मान, भूत, भविष्यद्‌ किया वोन प्रकार फी होहो हैं:--शारिरिक, सावसिफ, सासाशिक धर्म के अंग तीने हैं: विद्या, दात, वक्ष, ठुख तीन प्रकर के होते ई--आध्यात्मिक, आधिरेश्विफ/

आधिमीतिक

वायू गीन श्र की दीती ३*--शीवल, सेद, सुफुध कारण वीन प्रफ़ार के दोते हैं:-उपादान, निम्ित, साधारण

» अक्मणु-- शतपथ्र, गाएथ, एतिरेय, लाभ

बैणु-- व्ाक्षण, चत्रिय, बेश्य, शुद्र

» श्राश्षम-- अद्मचर्य, गृहस्थ, बासप्रस्थ, सन्‍्यास | » पुंग-- सतयुग, अंता, द्वापर, कलियुग !

» पदार्थ धर्म, अर्थ, क्राम, मोच

# श्वस्था-- जागृत, स्वप्न, मुपृप्ति' लुस्य

» ग्ेकार की रचना-- अण्ठत्न, स्वेदज, उद्धित, सरायुत् | ».. ४. के मत-- दीव, ब्रेदान्ल, बेंप्युतर, शाक ! अक्त-- चिज्ञाछु, अथार्थी, शान्त-चित; दुःखी ्व-- हाथी, घोड़े, रथ, पेदल | » «5 » निति के उपाय-- साम, द्वाम, दड, भेद ».. / बिर्ये-- पानी, चित्रिणी, दस्तिनी, शंखिनी ! पंच भूत-- आकाश, यायु, श्र्रि, जल, प्रथ्त्ी ! पांच ज्लानेस्दिगं-- आंख, कान, नाक, लिद्दा, त्वचा | अमन्द्रियें-- दाथ, पांव, मुख, मल्त और मुत्र के # बम-- अबिसा, सत्य, आ्रास्तव, अक्षय, 4 नियम-+ शौच, सन्तोय, तफ, स्वाध्याय, इश्वर-प्रगोधान | # चज्ञ-- अध्य, देव, भूत, पिठ अधितति।

# कोप-- अक्ष-मय, मनोमय, प्राश-मत्र, आनन्द-सय, खिल्लाननसय |

स्थान |

कैन्या- अद्विल्या, द्रौपदी, तारा, झुन्ती, मन्दोदरी » कामदेव के शर-- मोहित, मस्त, तफ्न, शुक्र, शिथिल्त

(7९०. )

» शब्द- ताख, मांम, तम्त्र, फूक, ठोक » जियार्थी के लक्षण -- काक-चेष्ठा, वक-ध्यान, श्वान-निद्रा, अल्पा-हार, सी-त्याग

» शत्रु मनुष्य के-- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद

» पाख्डव- युधिप्ठिर, भीम, अजु न, नकुल, सहरदे'

» अमृत- दूध, दद्दी, पी, शहद, गगाजल |

» ग्य (पंच गव्य)-- दूध, दद्दी, घो, गोवर, गो-मृत्र

» पिता-- जनक, उपनेता, समुर, अन्न-दाता, भय-न्राता। » मांता-- जननी, आचारयपत्ि, सास, राज-पत्नि, अन्‍्म-भूमि ) प्राण- प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान |

» तरु- मन्‍्दार, पारिजात, सन्‍्तान, कल्प-चृक्ष, हृरि-चन्दून छः बेद के अंग (बेदाह्)-- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष,

छन्द, निरुक्त | » उपांग (दुशेन वा शास्र)-- सांख्य, योग, न्याय, वेशेपिक, सीमांसा, वेदान्त डर रस छ. प्रकार के द्वोते हें-- कड़आ, कसैला, खट्टा, खारा, मीठा, चरपरा। ऋतुएं छः प्रकार की द्वोती ह-- बसंत, ग्रीएम, वषों, शरद, द्वेमन्त, शिशिर पदार्थ छः प्रकार के होते हैं- कय, गुण, कर्म, सम्बाय सामान्य, विशेष घोर ठुःख छः प्रकाए के होते हैँ-- गर्भ-ठुःख, जन्म-दुख, रोग-हु ख, ज्त-हु:

क्षघा-द्रु ख, सरण-दुःख राग छः प्रकार की होती हैं--- भैरव, मालकोस, हिण्डोल, दीपझ, मघ, श्री

(

शरीर के ब्रिकार छः प्रकार के होते हँ-- उत्पति, इृद्धि, स्थिति, परिच्रतव, न्यूनता, लाश |

लि

जीवन के छः गुण होते हैं: राज! मन्‍त्री के गुण

आसत, हे थीमाव, संशय !

खेती के द्वानि छः प्रकार से हो सकती द-- अतिद्रष्ट, अनार:

शल्षभ (टिड्ठ पड़ने से), मृसक्र (खिल में चूडे ब्यादा होने से),

राजाक्रमण (दूसरे राजा की चढ़ाइ करने से), रूगबुन्द (पत्तियां की अधिकता से)

एबी पर स्थल के सात मुख्य बड़े भाग माने गये देँ--जम्बू, प्रेल्न, शल्मलि, कुश, क्रोंच, पुष्कर, शाक | गदासागर सात प्रकार के साले सये हूँ--चीर, कार, दि, मधु, घृत, , सुरा, इत्ु-रस * हफ्ते सें सात बार होते

रबिबार, सोसबार, मंगलवार, युध-

बार, वृदस्पतिवार, शुक्रवार, शनिबार |

वेदों के अनुसार महपि साव हं-- विश्वामित्र, यौतम, ग्रमद्ति, चशिष्ठ, अज्ि, भरदाज, कश्यप!

|»... » आकाश सात प्रकार के हैं--

सबः, तप:, सत्य-लोक |

पृथ्वी के नीचे सात पाताल माने गये हँ-- अतल, दितल, खुल,

पेहातल, रसातल, सद्दातल पावचाल।

२२ )

बिया के रिपु सात हँ-- निद्रा, आलस, स्वाद, खुब, काम, चिन्ता, केलि। ,गायन के स्वर साव हँ-> खड़ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, घेवत, निषाद (संगीत में-- सा, रे, ग, मं, प, ध, नि) भारत के प्रसिद्ध सात पुरी है-- अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, (माया), कांची, अवतिका (उन्नन नगरी), द्वारिका बेदों के मतानुसार माने गये चिरजीब साव पुरुष हँ-- अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभिषण, कृपाचाय,

परशुसम मनुष्य के लिये सुख सांत प्रकार के माने गये हैं. -- खान, पान,

परिधान, ज्ञान, गान, शोभा, संयोग राजा के मुख्य अंग सात माने गये हँ--

रानी, युवराज, सन्‍्त्री, मित्र, देश, सेना, कोष, (खजाना) | मुखे ख्तियें आठ प्रकार की होती हैँ --

साहस अन्त, चपलता, माया, भय, श्रविधेक: अशौच,

| निर्देयता आठ दिशाओं के दिग्गज (दिशाशरं के बड़े हाथी) इस प्रकार हैं--

पुण्डरीक, वामन, छुसुद, ,एरायत, सुप्रतीक, साथे भौम,

& 5 * अज्न, पुप्पदन्त | आठ प्रकार के नाग इस प्रकार के ह-

अनस्त, तक्षक, कार्कोटिक, मद्ापद्म, वासुकि, शेख, कुलिक,

पड्ा। अष्ट छाप के कवि इस प्रकार हे--

सूरदास, #प्णदास, परमानन्ददास, कुम्मनदास,

चतुमु जदास, छीतस्वामी, गोविन्दास, नन्ददास।

|)

अंग के आठ अज्ाम (अफइ-प्रशाम) हँ-- ३५. शिर, जाबु, सु; दस चरण, मन, बचने भातु आठ प्रकार की है लोहा, सोना, वाँवा, चाँदी. उत्ता, पारा, $ शीशा, एंगा शी कृष्ण की आठ पटरानियाँ धीं-- लच्मणा, रक्मिणी, सत्यभामा; भद्रा, सत्या, जासबन्ती, छालिन्दी मिन्न ढल्दा बिबाइ के भेद धाठ हैँ-- जाह्म, देव, आपे प्रालापत्व, आसुर, गान्वर्व राक्स्, पैशाच | आज कल त्राह्म विचाह प्रचालित है। आठ देवताओ्ों के समुद्द को बसु कहते दें वे इस प्रकार दै--- सूथे, चन्द्र, नक्षत्र, पूरी, जल, अप्रि, वाबु,आ्रकाश कहाई घाठ अडाए की दोती दै-- अशुमन्‍्ता, बिशसिता, नियन्‍्ता, क्रयी, विक्रयी, संस्कत्ती, उपहत्तो, खादक | करे छठ प्रकार के हैं-- खाना, पोना, सोना, जागना, सन्तानोप्रत्ति, स्त्रु से रक्षण, जन्म, मरण दिग्पाल भ्राठ हं--इस्र, झग्ति, यम, नेऋत्य, घरुण, बायु, कुबे २, ईशान, नव-स्य--पत्च-भूत +काज, दिशा, आत्मा, मत! #.. खनिजनल-मारणिक, मरकत, कुलिश, पत्ना नीलम, पुल्चराज, गुगेद, लद्दतुनियाँ, सूं गा ! ७». विक्म की समा के रन--धन्वन्तरि, क्षपलक, अमरसिद्द; वेताल, शंक्ु, चाराइमिहर, घटलपेर, कालीदाह ».. तिषि-च्छप, झुन्द मुकुन्द नील, शंख, खबे, पद्म: मद्ापत्म, सकर उस्ड--भरव, इलावसते, श्युरुपं, भद्राश्र, केतुमाल, डिसय, इरि, कुरु, रस्य्छ।

सक्ति--अबण, दीत्तेन, स्मरण, अचेन, बन्दन, दात्य, आत्म- लिवेद्स, पाद-सेचल, चखान

( २४ )

»५.. दुगे-रोल-पुत्री, बह्चारिशी, चम्रधस्टा, कृष्मीयहक, माता, फास्यायिनी, काणसत्ि, मद्दागौरी, सिड्धिद।! ५. झ+-सूजे, चर, मंगल, बुष, शुरु, शुरू, शनि, राह, केंतु। मा इन (हिंदी के) चदद, सूए, तुलसी, केशव, विद्वाए, भूषण, गविएर, देवा हरिधन्द्र ( ५... गुष--( आाद्वाों के ) घूति, त्तमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्र पतरभरहृ, थी, विद्या, क्रोध-त्याग ) दुह घर्ष के लक्‍ण--धूति, कमा, दम, अप्तेय, शौच, इम्द्रिय-निग्रद, भी, विद्या, सत्य, भक्नोघ ५... दिश्पात-गरुइृध्यञ, गोविन्द, अग्ति, पवन, ईश, रक्त, यम सुरपति, धनदू, वारुछि ! ५. भर हे पालने वागे-“मशेदाक, मोभी, उनमच, जल्दबाज, हीधी कमी, मानी, डरा हुआ, अधीन, हुःली ! ,.. इविा->आँ, कान, लाक, ज्ीस, त्वचा, द्वाथ, बाँव, हुँढः मही और मूत्र फे स्थान + हिशा--पूर्ष, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आगनेऐ, बायब्य, ईशान, नैआऋत्य, आकाश, पाताल 3... अनिद >हिश, केस, फट, प्रश्न, सुण्डर, भागइक्य, ऐसिरेय हैचिरेय, छाम्दोग्य, इृद्ददृ|रख्यफ गाएगशि--मेप, वृष, सिशुन, कक, सिंह, कम्या, छुला, बुख्थिक, धन। मबर, कुम्फ, मीन ».. आफाण-किंकिए, नूपुर, छाए न, सेँदरी, चूड़ी, कन्नत शीश-फूत्त, चीर, कण्ठा, बाजूइसनद, टोका। 6... ठेल-सांत आआकोश+लात पाताल, (डापर कह आये दे ) रहह-तिधि--प्रतिपदा, छिलीया, तुनोया चतुर्भी, प्॑चमी, य्ठी, सप्तमी,

अष्टमी, नवम्री, दशर्मी, एश्ादशी, दादशी त्रयोदशो, अमावस्या का पूछिसा

छत

(रह)

मयार-अहुनुचि, मंजन, निर्मज्-बस्त्र, सद्दावर, पाल-सँबारना शाँग में लिदूर भरता, मस्तक पर खौर, गाल और चिबुक पर तिल्ल, केशर सतना, मेंहदी लगाना, पुस्पभूषण, स्वणु-भूपण, मुब्-बा्, दाँों में मिस्सी, वाम्वूल खाता, नेत्रों में काजल लगाना | पूजा-स्वागत, चस्णन्बन्दना, अध्य आासत, गृह-प्रवेश, श्राचमन, मधुयके, मजझ्ञन, चन्दन, बल्ाभूषण, गन्ध, पुष्प, धूप, हप, नेवेद, व्यंजन !

(हिन्दी! कल्प दाता! से)

अध्याय दो या दो से घिञ्क पर्दों के मेत्ञ को उप्तात्न कहते हैँ। इनके अन्तिम पद में विभक्ति रहती है जैले:-- समस्त (पूरा) पद बिग्रह राजउन्न राज्ञा का पुत्र शरणाग्त शरण को आगत चम्द्रमुख चन्द्र॒णा के सम्ताल है मुख जिसका

समास 5: अक् के होते हैं: इन्द्र. 2२ टिंगु.. कर्मघारव तस्पुरुष अव्ययीभाव चहुबोदि

ल्‍द्व सम्रासः-- जिश्व समास में और शब्द का लोप होता है इसे इन्द्र समाप्त ऋहते हूँ | जैसे:--

जाता पिता माता और पिठा ऋंद मूल-फच कंद और मूल और फल म्त-करस-चचतन

सच और क्रम और बचस राज और रानी

( २३ )

भाई-घढ्िन भाई और बहिन

गुर-शिष्य, पिठा-पुत्र, पति-परिन, पाप-पुए्य, अन्न-जल, शत-दिन लेन-देन हे कर्म घारयः-- जिस समास में पहिला पद विशेष द्वोवा दे बसे वमंध्रासय क्षम्रात्त कददते हैं जैसे:--

परमेश्बर परम है जो ईश्वर परमसुख्दर मे ७४ कह सुस्दरे .दुष्रति दुआ है जो मति अल्पबुद्धि अल्प है जो बुद्धि साधुरामना साध्दी है जो कामना क्म्पितल्ञवा क्म्पित है नो लता

चन्द्रमुख, छुमति, कमल नेत्र, फुल्लौरी, नीतगाय, खल्नतन, मदद“ राजा, दुबागी

तत्पुरुप समासः-- जिम ममास सें उत्तर पद प्रधान द्ोत/ है. उसे तथुदंष एणास कहते हैं जेसे---

शरणापत्त शरण फो शआरागत

शोकाकुक्त शोक से व्याकुल

सोक्षंध मोह से अंध

शापमुक्त शाप से मुक्त

आध्यास्त अ्रादि से अन्त की गगाजल गंगा का जला

गुरोपदेश गुरु का उपदेश

रथारुद रथ से आरुड़

सेबानिए्त सेव में निरतत

चन्द्र प्रकाश, राजमाता, गग।दट, जलघाण, राजपुरुष, ६ईमारा;

विद्यालय, प्रेमदश, समरसुभद, मूमिशयन, भमरक्त, दहेड़ी, बनमानुप तह्पूत, रामसायकलिकर

( २७ )

निबन्ध रचना का अभ्यास विषय की अभिन्नता

विविव-विषयों की सिवस्ध-ए्वना के लिये विविथ-विपयों की अप्रितञता आवश्यक है। विपय की शुद्ध जानक्रारी विन्ना, रचना का केश ही अभ्यासी हो, लेख नहीं लिख सकता यह छोटी पुस्तक संसार-भर की बातें दता-कर, रचना का आादश और दिपय-अमिज्ञता का भार दिखा सकती है ! विषय-अभिज्ञत्रा के लिये पुस्तराध्ययन, सत्संग, देशाटस, व्यवद्ाए-कुशतता शऔर असुभव-शक्ति, निरीक्षणशक्ति, वदिचारशक्ति, कल्पनाशक्ति, विव्रेचनशक्ति का ठीक उपयोग आदि अनेक ध्यापार हैं। देखो-भालो, छुनो-सममो, पढ़ी -लिखो, सोचो-बि चारो; अनेक बिपग्रें की अभि्ञता प्राप्त होती ज्ञायगी जाने हुए बिपग्र को या द्रिएय शानकर तिदन्ध-रचणा की रोति के शानुसार रचना का अ्रध्यास्त करो |

प्रबंध भेद गें तो विषय-भेद से प्रस्वेक निबंध एक दुसरे से प्रथकू ही होता है; परन्तु सामान्यतः: बर्णुनात्मक, ऋषात्मक, व्याख्यात्मक और आलोचनाध्मक, चार प्रकार के मोटे भेद हूँ)

उ्गेनात्मक किसी वस्तु का सामान्यहप में बेन कप्ता-लिसे रू आँलोंसे है, छा्ों से छुना है अ्रथवा और किस्ती रीति से ज्ञाना है, जैसे:--'ताज पहल! प्नीम का वेढ', लोहा 'आगरे झा दिला! भाँसों करेलवे सेशन, जनकपुर को ज्ोस्ा', 'सीता जो हो हुन्रता' प्रयाग की अदश्िनो!, 'यपुना की छरः ईं

( २६ )

किसी ऐहिहासिक-घटना को तक पर तोल कर उसके सत्यासत्य का निर्णय इसी भेद में जाता है। 'मह्य को खुराक क्या है! “समायण से जया लाम है? ! विप्राह कब होना चाहिये?” 'मरना ही जीना है' ! “सृष्टि कैसे व्यपन दोती है? ! "गाँव में रहना अच्छा है या शहर में दो बिरुद्ध विचारों तथा मिलते जुलते विचारों क्री तुलना भी इसी विभाग में होती है; जैसे-खतनवद्वा थौर स्वेच्छाचार वा खतन्वता और परतन्रता आदि यदि ये निव्ंध तर्क पर तोले जाँय केवल व्याख्या ही रे, तो वह मिख्यात्मक ही कहलाएँगे।

या प्रथक्‌ सेद बतक्ताएं गए हैँ, किन्तु आप बड़े लेखकों के लें में दो, तीन था पम्पूर्ण भेदों का मिश्रण देखेंगे

प्रबन्ध का दाँचा

किप्ती प्रकार का प्रवन्ध लिखना दो, तो लिक्षमे से पहिले उसे इचित भागों सें बाँठ लेना चाहिये इस प्रकार दिपय को बाँटने से पड़े खेखकों को भी बड़ी लुदिधा हो ज्ञाती है, पर नौसिखिया केखक तो इसके बिता ठीक लिख ही सही पकते | ऐसा करने से लेखक सीमा के भीतर रहेगा और विषय के अद्मप्रत्यक्ष पर प्रकाश ढाल सकेगा। टीक समय के भीतर डचित पंक्ति और प्रृष्ठों में निबन्ध क्रो पुरा कर देगा और क्रम भी ठोछू बैठ जायया | लिखने से प्रथम लेख के बिपय डाल कर उसके सम्बन्ध में जितनी बातें ध्योन में आर्चे, (क पर नोट करलो और ठीछ सिलसिले से जसा कर कम बाँचो ! किसी बस्तु के सम्बन्ध में मोदे सोटे तीन शीर्पऋ हो सकते डं,ि और ठपयोग जीव पर ल्रिखना ह्वो तो किस श्कार का जीव हू, डा

वा धाड्र और गठठ, खसात और सोजन, फहोँ पाया जाता है और इबवा उपयोग | चीरज़ पर लिखना दै तों, थी

पगज का महत्व; यह शुख श्रम्याश्न हें चढ़ हक्ता

क्या है किनमें होता है ?

' मह है क्ष्त्ती के चरित्र के विसताग उप्छ! चरित्र की विशेषता के अदुसाए पुयक्र प्रथक्‌ दो सकते हैं, पर

( ३९ )

मोटी रीवि से, अन्मकाद और माता पिता, बाल्यावस्था (पालन, पोषण और शिक्षा), छोवन की पुख्य घय्नाएँ थौर प्रृत्युत विपय का प्रारम्म जब तुम्हारे प्रबन्ध की सूची दन जाय तो देखो कि कितने समय और कितने स्थान में प्रत्रन्‍्य लिखना है | मात लिया एक घाटे में से समाप्त करना है। उममें से १४ मिनट तो सोचने और ढॉवे को लि गये ग्हे 2४ मिनट, उसको तुम्हारे प्रबन्ध के £ उपशीर्षक दैटअः पर बॉट तो अस्येक्त शीपेक को गिनट मिले अतः सामान्यतः एक शीर्षक मिनट में समाप्त होना चाहिये उपशीर्षक के छोटे बड़े होते के अनुसार प्राय भी फम बढ़ हो सकता है | रहो स्थान की बाते, मान लिया क्रि ४० पंक्ति में लेख पूरा करना है, एक शीपेह में सामान्यतः १० पंक्ति द्वोनी चाद्विये। उपशीपक के छोटे बड़े होने के अनुसार एक उपशीक न्यूनाधिक पंक्तियों में लिखा जा सता है इन सब बातों पर विचार करके लिखना आरम्भ करो। आएम्म करने का कोई मुख्य नियम नहीं है। विभिन्न-लेखक एक्द्दी लेख फो विभिन्न प्रवार से भाररभ फरते हैं कोई विपय की भूमिका बॉँधकर, फोई परिभाषा फद क0

कोई किसी कहावत था कविवाक्य को कद्द कर, फोई विपय फ्रासार कह कर और फोई घटना का सध्य पकड़ कर लेख आरस्म कर देते हैं !

विस्तार

आपस्म्म करने के पीछे सूची के प्रत्येक उ्पशीरषेक को लक्ष करके वाक्य-समूदद या अनुच्छेद (पेराम्राफ) की रचना होनी चाद्िये एक वाक्य-समूद के चाक्यों में पारस्परिफ और आलुपू् सम्बन्ध होना चाहिये | एक वाक्य-समूह में धरणित भार्वा के लघुत्त्य गुरुत्व अनुसार अनुच्छेद छोटा और बड़ा होता है भाव गुरुत्त के कारण कभी एक भाव, एक से अधिक अनुच्छेदों में लिखा जाता है इसी प्रकार सूची

( हे१ )

के इर पक डप्शीपक पर अनुच्छेद-रचना करो और जिस प्रकार एक अचुच्छेद के सच वाक्‍्यों में पारस्परिक-आउुपूर्य -सम्धन्ध होता है, इसी भाँति दक दिपय्र के सव अलुच्छेदों में पारस्परिक-झआतुपृर्व सम्बन्ध ' होता हैं | किसी भाव के! पुष्टि में कोई कद्दावत, किसी कृषि छा बचन अधवा कई रदाहरण लिखता उचित हो, लिख देना आहिये | परम्तु आाइरण संक्षिप्त ही और विषय से पूरा संबंध एखता दो।

समाप्ति समाप्ति होने पर उसे यों दी एक दम मत छोड़ दो संझषेप में था ते क्षपने निबंध का सार दो; या कोई शिक्षा मिलती हो, पह दिखा देह वा फोई ब्यसे अप्रत्यक्षपपरिणा/म मलकता हो, स्पष्ट कर दो और एक बार फिर पद जाओ ऊँ पर विशामदि चिह छूट गये हों प्रथवा कोई व्याकरण पर मुद्दाबिरे की भूल दो गई हो, ठोक करलो !

खेती

खेती सथ घन्धों में उत्तम है। इसी के द्वारा हम क्लोगों को खाने को श्रज्न, तरकारी आदि शनेक चीज़ें मिलती हूँ। यदि खेती द्ोतो, तो हस

छोणें को खाने को भन्न कहां से आता खेती हिन्दुस्तान में प्राचीन काज्ष से होतो घाई |

अनाज पंदा करने के लिये खेत में खाद डालकर पहिले खुब दल जोसते + &। खाद के दालने से जमीन ताकतवर हो जाती है और इस से अच्छी पैदावार होती

हल चलते बले को इलत्राद्य या इसद्यारा ऋदते हर नह हल का जिबर चाहता है ले जाता है। एक दाथ से हल की मुठिया को पकड़ता है और दूसरे द्वाथ से वे को दवांकता है इल लकड़ी का बनता है और दो

| को से चक्षावा जाता है| इंत्त का चहू हिस्सा जो

( हर ) वैल्लों के क्यों पर रक्‍्धा जाता है उसे जुआ बहते हैं. भौर हे के हलबट्टे के द्वाथ में रूवा दै बसे मूठ, और मूठ के नीचे जो भारी लकड़ी में,एक तैंज छोहा,लगा रहता है उसे फारा कहते दै। द्र्स जे में दल बैलो से चलाया जाता है, पर इगलिस्वान में पोड़ों से बला

हर

जब जमीन द॒क से खूब जोत लेते दें, तो उसे पदेला 2 पराबर करे हैं. और फिर हल चलाकर अनाज के बीज बोते दूँ और जग की जमीन को बरायर कर बेते हूँ। जब पौधे उगकर बड़े होते दें? पी उहं पानी से सींचते हैँ. भौर जब अनाज पक जाया है, पे पी

काटकर खत्तियान में रखते हँ। फिर बेलों से खुदबाकर भूंता री करके, अ्रताज निकाल लेते है.।

जब खेत डी जमीक कमजोर द्वो जाती है, तब उस में. घाद़ डालने रु च्एपल्‌ पद्री है ( खए्द्‌ कह पद से बनपे हैं, णएतु, हिलटप्तान में गोबर और पास से खेत मज़बूत हो जाता है। शांद डालने से पद्विली घार अधान खूब पैदा होता है, क्योंकि खाद से जमीन वाफत मोर हो जाती है, परन्तु फिर खेत को कह बार जोतने भौर बोनें से जमीन कमनोर हो जाती है। इस देश में बहुत कर, वे पढ़े किसान खेती करो हैं, इस कारण भधिक लाम नहीं होता अब हमारे परम वैयालु भी सन्त सरकार फा ध्यान इस झोर अंधिऊ हुआ है और छ्लेतें की उन्नति के लिये लाखों रुपये हर साल खर्च कर रहे हैं। यदि किपान तोग शिक्षा वाकर इस फाम को नरें ते बहुत काम हो सकता है

ऊख (गन्ना) ऊख गर्म देशों में उत्पन्न देती है, इसके पेढ़ को गा कदेते हैँ, जो द्दी दो तीन गज और कहीं इससे भी अधिक ऊंचा होता है।

( हेई )

मुटाई भी इसकी एक गिरह तक होती है इसके ऊपर हम्वे हरे प्त्ते हुघारे नोकदार होते हैं | गश्ने के ऊपरी माय को अकोला कहते हैं। उन्न। आप ही इक है और अपने आप ही फज्न है और वृक्षों की भांति "पमें फंल नहीं लगता, फल्न में उसका बीज होता है

बह इस प्रकार वोया जाता है कि, पहिल्ले भूमि को खूब ज्ोतते हैं केसान कहा करते हैं कि, ऊद् के लिये भूमि को जब जुती जानिये, के जो इस पर पात्ती भरा घढ़ा गिरे तो यह दूटे नहीं, यदि उसकी मे का पिन्‍्डा बनाकर रब्खें, तो बह लेठ झास से भी छुखे नहीं। भव भूमि जुवकर, तैयार हो जाती है, तो वोने से कुछ दिन पहिले पड़ठा खोदकर, ग्नों की फांद की फांद चिछ देते हैं. और उस पर मिट्टी डाल देते हूँ। थोड़े दिनों में गांठों पर वहां से शाखाएँ निकल आती हैं, जहां उनकी आंज होती है। किए उन गन्नों को तिकात् कर एक एक विल्लांद के टुकड़े करके फागुन चैत्र माल में लेटा दबा देते हैं।

टहनियाँ बढ़ती हूं जब उनके पत्तों छा हरा रंग बदलता है, तो गये पक जाते दूँ तत्र उनको उखेड़- लेते हैं

फिर गन्नों के टुकड़े करके कोल्हू या वेलन मे रखकर, रस लिकाह्ते हैं कोई गल्ने ऐसे एसीले होते हैँ कि, मन भर में तीस सेर तक रस निकलता है बह रस गदल्ला पानी सा द्वोता है। उसमें किसी तरह से चूना ढाल देते हूँ, कि वह उफत जावे

रस को छान कर लोहे या वांवे के कड़ाहों में डालकर, पकाते हूँ

/ ऊपर से मेल छुचेल उतारते जाते हैं। जब एस पक कर गाद़ा हो जाता है और उस्च में तार उठे लगता है, तो आंच को थीसी कर देसे हैं, फिए चाक पर उसेश्ने सेलट केते और लोहे या लकड़ी के चंडये से चांइते हैँ अथीत्‌ चारों ओर से खींच कर इकद्धा करते हैं

( इेश )

+ दिस जाने के ढर से उन में लोढे के लाल बंधवा देते हैं। अरत पे अच्छे थोड़े कही नहीं होते ओर बड़े ढीठ, साहसी और आज्ञाकारी ते हूँ, क्योंकि जब स्वासी सोता हे, तब यह पह्विस देता है! चदि ॥| भनुप्य या जोब पास आदे, तो शीघ्र स््ामी को जगा देगा अरब लोग भी अपने घोड़ों को पुत्र की भांति पालते और मानते हूँ और शोड़ों को नहीं बेचते, चाढ़े भूखों क्यों मरजाय॑ घोड़ा सलुष्य # बहुत काम में आता है, सवार होने, साई था वस्दी जोतते तथा तेम लादने सें इसके समान कोई चोपाया नहीं हू।

एक बार एक अरबी को उसके दुश्मनों मे उसके बोड़े समेत पकड़ जिया और इसके हाथ पांव बांबकर, इसे जमीस पर डाल दिया | इस अखी को ठुःख और चिन्ता के कारण रात से नींद आई बुरी तरद करह रा था | झसकी आवाज झुन्न, उस का चोड हिनहिनावा अरवी ने सोचा, कि किसी तरह अपने घोड़ें को छुड़ता चाहिये |गह त्रिचार, तरकता घोड़े के पास पहुँचा और घोड़े के रस्से को दांतों से रोलकर उससे कहा, कि धर को भागजा, परन्तु वह घोड़ा अपने मालिक को छोड़कर बहवं से हद और यह सोचने क्षमा, किसी तरह से अपने सवा्ी को यहां से लेचलूं असवी की ऋमर पर एक पेटी व॑धी थी, उसी को दांतों से पकड़ ऋर, घोड़े ने उठा लिया और अपने डेरे की और हे भागा और भागता अपने म्थजिक्त को डेरे तक ले गया और बह जाकर रख दिया छोड़ा बहुत थक जाने के कारण डेरे तक्ष पहुंचऋर. गिरपद्ा ओर बहा पर मर गद्य | घोड़े ने अपनी जान देदी, / पल्तु अपने मालिक की जान बचाली विद्वावियों देखो ! जब जालबर तक अपने पालने व्ल्लि का इतसा ज़याल रखते हैँ, फिर तुम तो मनुष्य हो तुमको चाहिये, क्लि अपने

माता पिता की श्षिक्षाओं क्ले खूब बाद रक्खझो और उस की इद्ध अचस्था डोने पर उन को सुख दो

(३६ ) दूध

दूध बहुन बलद्ायक वात है। फेयल पानी पीने से मनुष्य नहीं जी. सकता, परन्तु केवल दूध पीकर मतुप्य जी सकता है, जब बचा पैदा होता है, तय यह फेयल दूध पी सता है। दूध है सिव्राय और फोई कड़ी पौई| नहीं खा सकता मनुष्यों में कोई ऐसा रहीं, किसते बचपन में मंवो' हाई या गाय, बकरी आदि का दूध ने पीया हो।